अलसी (तीसी )के गुण और प्रयोग
*जाने अलसी (तीसी )के गुण और प्रयोग कर इसका लाभ उठाये*
■ अलसी की खेती मुख्यत: बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में होती है।
अलसी का पौधा 2 से 4 फुट ऊंचा होता है।
इसके पत्ते रेखाकार एक से तीन इंच लंबे होते हैं।
फूल मंजरियों में हलके नीले रंग के होते हैं।
फल कलश के समान आकार के होते हैं, जिसमें 10 बीज होते हैं।
बीज ललाई लिए चपटे, अंडाकार, चमकदार होते हैं। बीजों से अलसी का तेल बनता है।
अलसी की जड़ सफेद रंग की, पेंसिल जितनी मोटी और 4 से 10 इंच लंबी होती है।
*देश की विभिन्न भाषाओं में नाम:*
➖संस्कृत अतसी, नील पुष्पी, क्षुमा,
उमा, पिच्छला, अतसी।
➖हिंदी अलसी, तीसी।
➖मराठी जवसु।
➖गुजराती अलशी, अलसी।
➖बंगाली मर्शिना।
➖तेलगू बित्तु, अलसि, अतसी।
➖अंग्रेजी फ्लैक्स सीड
*अलसी मे मौजूद पोषक तत्व*
अलसी के बीज में प्रति 3.5 औंस (100 ग्राम) 534 कैलोरी होती है - प्रत्येक चम्मच (10 ग्राम) साबुत बीज में 55 कैलोरी होती है।
इनमें 42% वसा, 29% कार्बोहाइड्रेट और 18% प्रोटीन होता है।
*एक बड़ा चम्मच (10 ग्राम) साबुत अलसी के बीज निम्नलिखित पोषक तत्व प्रदान करते हैं *
कैलोरी: 55
पानी: 7%
प्रोटीन: 1.9 ग्राम
कार्ब्स: 3 ग्राम
चीनी: 0.2 ग्राम
फाइबर: 2.8 ग्राम
वसा: 4.3 ग्राम
कार्ब्स और फाइबर
अलसी के बीज 29% कार्ब्स से बने होते हैं - जिनमें से 95% फाइबर होता है।
दो बड़े चम्मच (20 ग्राम) अलसी के बीज लगभग 6 ग्राम फाइबर प्रदान करते हैं।
20-40% घुलनशील फाइबर
60-80% अघुलनशील फाइबर
घुलनशील फाइबर रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है। यह आपके लाभकारी आंत बैक्टीरिया को पोषित करके पाचन स्वास्थ्य को भी बढ़ावा देता है
अलसी के बीज का सेवन नियमितता को बढ़ावा देने, कब्ज को रोकने और मधुमेह के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है
*प्रोटीन*
अलसी के बीज 18% प्रोटीन से बने होते हैं । उनका अमीनो एसिड प्रोफाइल सोयाबीन के बराबर है।
अलसी के बीजों में अमीनो एसिड आर्जिनिन और ग्लूटामाइन की मात्रा अधिक होती है - ये दोनों हृदय और प्रतिरक्षा प्रणाली के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं
*वसा (फैट )*
अलसी के बीज में 42% वसा होती है, जिसमें 1 बड़ा चम्मच (10 ग्राम) 4.3 ग्राम प्रदान करता है।
यह वसा सामग्री किससे बनी है
73% पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड, जैसे ओमेगा-6 फैटी एसिड और ओमेगा-3 फैटी एसिड अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (एएलए)
27% मोनोअनसैचुरेटेड और संतृप्त फैटी एसिड
अलसी के बीज ALA के सबसे समृद्ध आहार स्रोतों में से एक हैं।
*■ रंग*
अलसी का रंग लाल होता है।
*■ स्वाद*
इसका स्वाद फीका होता है।
*प्रकृति*
अलसी ठंड प्रकृति की होती है।
*■ स्वरूप*
अलसी एक अनाज है जो खेतों में बोया जाता है। इसके फूल नीले और फल हरे रंग के होते हैं। उन्ही के अंदर यह लाल रंग की चिपटी दाना वाली होती है।
*गुण*
■ अलसी मधुर, तीखी, गुरू (भारी), स्निग्ध (चिकनी), गर्म प्रकृति, पाक में तीखी, वात नाशक, कफ़-पित्त वर्धक, आंखों के रोग, व्रण शोथ (जख्मों की सूजन) और वीर्य के दोषों का नाश करती है। अलसी का तेल मधु, वात नाशक, कुछ कसैला, स्निग्ध, उष्ण, कफ़ और खांसी नाशक, पाक में चरपरा होता है।
*⚠हानिकारक*
अलसी का अधिक मात्रा में उपयोग आंखों के लिए हानिकारक होता है। यह अंडकोष, पाचनतंत्र (पाचन क्रिया) को नुकसान पहुंचाती है और शुक्रनाशक भी कही जाती है।
*10 विभिन्न रोगों में उपयोगी:*
*(1). वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला):*
अलसी का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर 2 बार नियमित रूप से दूध के साथ कुछ हफ्ते तक पीने से वीर्य बढ़ता है।
*(2). अनिद्रा (नींद का न आना):*
अलसी तथा अरंड का शुद्ध तेल बराबर की मात्रा में मिलाकर कांसे की थाली में कांसे के ही बर्तन से ही खूब घोंटकर आंख में सुरमे की तरह लगायें। इससे नींद अच्छी आती है।
*(3). कफयुक्त खांसी:*
भुनी अलसी पुदीने के साथ शहद में मिलाकर चाटने से कफयुक्त खांसी नष्ट होती है।
*(4). मुंह के छाले*
अलसी का तेल छालों पर दिन में 2-3 बार लगाने से छालों में आराम होगा।
*(5). फोड़ा-फुंसी*
अलसी के बीज तथा उसके एक चौथाई मात्रा में सरसों को एक साथ लेकर पीस लें। फिर लेप बनाकर लगाएं। 2-3 बार के लेप से फोड़ा बैठ जाएगा या पककर फूट जाएगा।
■ अलसी को पानी में पीसकर उसमें थोड़ा जौ का सत्तू मिलाकर खट्टे दही के साथ फोड़े पर लेप करने से फोड़ा पक जाता है।
■ वात प्रधान फोड़े में अगर जलन और दर्द हो तो तिल और अलसी को भूनकर गाय के दूध में उबालकर, ठंडा होने पर उसी दूध में उन्हें पीसकर फोड़े पर लेप करने से लाभ होता है।
■ अगर फोड़े को पकाकर उसका मवाद निकालना हो तो अलसी की पुल्टिस (पोटली) में 2 चुटकी हल्दी मिलाकर फोड़े पर बांध दें।
*(6). कब्ज*
रात्रि में सोते समय 1 से 2 चम्मच अलसी के बीज ताजा पानी से निगल लें। इससे आंतों की खुश्की दूर होकर मल साफ होगा। अलसी का तेल 1 चम्मच की मात्रा में सोते समय पीने से यही लाभ मिलेगा।
■ अलसी के पत्तों की सब्जी बनाकर खाने से पेट की गैस मिटती है।
*(7). आग से जलने पर:*
चूने के निथारे हुऐ पानी में अलसी के तेल को फेंटकर जले हुए भाग पर लगाने से जलन और दर्द में आराम मिलता है और फफोले भी नहीं पड़ते। यदि घाव पूर्व में हो चुके हों तो शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं।
■ शुद्ध अलसी तेल और चूने का निथरा हुआ पानी बराबर मात्रा में एकत्रकर अच्छी प्रकार घोट लें। यह सफेद मलहम जैसा हो जाता है। अंग्रेजी में इसे कारोन आयल कहते है। इसको जले स्थान पर लगाने से शीघ्र ही घाव की पीड़ा दूर हो जाती है और 1 या 2 बार लेप करते रहने से घाव शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
*(8). पीठ, कमर का दर्द:*
सोंठ का चूर्ण अलसी के तेल में गर्म करके पीठ, कमर की मालिश करने से दर्द की शिकायत दूर हो जाती है।
*(9). कान का दर्द*
■ अलसी के बीजों को प्याज के रस में पकाकर छान लें। इसकी 2-3 बूंदे कान में टपकाएं। इससे कान का दर्द एवं कान की सूजन दूर हो जाएगी।
*(10). कान में सूजन और गांठ:*
अलसी को प्याज के रस में डालकर अच्छी तरह से पका लें। इस रस को कान में डालने से कान के अंदर की सूजन दूर हो जाती है।
*इस लेख को लिखने का मेरा एक ही उद्देश्य है कि इससे आम भारतीयों का स्वास्थ्य बेहतर हो हमारे इस प्रयास से किसी एक व्यक्ति का भी भला होता है तो मेरा प्रयास सफल होगा,आप इसका लाभ उठाये व अन्य लोगो को तक पहुचाये !*
*किसी भी प्रकार की चिकित्सा सम्बन्धी सलाह हेतु अपनी समस्या विस्तार पूर्वक 9431143271 पर व्हाट्सएप करे या सुबह 10-12 के बीच फोन करें।*
*एक गोमाता को घर मे जगह दे समय निकालें, ये न कर सकें तो गौशाला या गोपालकों का सहयोग करें, ये भी न कर सकें तो कम से कम गौ उत्पाद व देशी गाय का दूध ही किसी भी कीमत पर लेने का संकल्प करें जिससे अप्रत्यक्ष रूप से गौपालन को मदद होगा व गोमाता बच जाएंगी।*
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